Thursday, May 6, 2021
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ईद-उल-जुहा (बकरीद) का त्यौहार क्यों मनाया जाता है,जानें कारण

ईद-उल-जुहा यानी बकरीद का त्यौहार मुस्लिम भाइयों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार होता है बकरीद का त्यौहार चांद दिखने के 10 दिन बाद मनाया जाता है | ईद उल जुहा बकरीद के त्यौहार को कुर्बानी का त्यौहार भी करते हैं |

यह मीठी ईद के लगभग 2 महीने 10 दिन बाद मनाया जाता है या फिर एक या 2 दिन का अंतर होता है, यह चांद के ऊपर निर्भर करता है | इस वर्ष बकरीद का त्यौहार 31 जुलाई या फिर 1 अगस्त को मनाया जाएगा |

बकरीद फोटो 2020

बक़रीद के शुभ अवसर पर मुस्लिम भाई ज्यादातर बकरे की कुर्बानी देतें हैं बहुत से लोगों के मन में यह विचार आता है कि बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी क्यों दी जाती है किसी और पशु की कुर्बानी क्यों नहीं दी जाती तो इसका जवाब यह है कि कुर्बानी किसी अन्य पशुओं की भी दी जा सकती है| जिस पशु से आपको अधिक प्यार हो पर बकरे की कुर्बानी का कुछ अलग ही महत्व है|

यह भी पढ़े:- ईद उल जुहा (बकरीद)को लेकर सरकार ने जारी की नई गाइडलाइन

तो दोस्तों आइए जान लेते हैं कि बकरीद पर्व क्यों मनाया जाता है और इसके पीछे की क्या कहानियां है|

बकरीद पर्व मनाए जाने के पीछे की कहानियां

इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक कुरान में बकरीद के बनाए जाने का जिक्र मिलता है | इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुसार हजरत इब्राहिम को अल्लाह का पैगंबर माना जाता है । वह हमेशा दुनिया के भलाई के लिए काम करते थे और उनका सारा जीवन समाज कल्याण की सेवाओं में बीता। करीब 80 साल की उम्र तक उन्हें कोई संतान नहीं हुआ तब उन्होंने अल्लाह की इबादत की और उन्हें एक सुंदर बेटा इस्माइल मिला ।

ऐसे शुरू हुई कुर्बानी की प्रथा

ऐसा कहा जाता है कि एक दिन अल्लाह ने हजरत इब्राहिम का परीक्षा लेने के लिए उनके सपनों में आकर उनके सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी, तो हजरत इब्राहिम ने सबसे पहले अपने ऊंट की कुर्बानी दे दी फिर अगले दिन उन्हें सपना आया कि अपने सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी तो तब उन्होंने अपने सभी जानवरों की कुर्बानी दे दी| फिर उन्हें ख्याल आया कि उनका सबसे प्यारा चीज तो उनका बेटा इस्माइल है|

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तब हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने का निर्णय लिया| उन्होंने अपने पत्नी को आदेश दिया कि इस्माइल को नहला धुला कर कुर्बानी के लिए तैयार कैसे किया जाए | ठीक ऐसा ही हुआ, हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए गए| एक तरफ उनका अपने बेटे के लिए प्यार था वहीँ दूसरी तरफ अल्लाह का हुक्म, उन्होंने अल्लाह के हुक्म का पालन किया और अपने बेटे को कुर्बानी के लिए लेकर चल दिए|

कुर्बानी देने की बारी आयी तो उन्हें अपने बेटे के लिए प्यार आ रहा था, तब उनकी आँखों पर पट्टी बांध ली| जब हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी करने लगे तभी फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन नें इस्माइल के जगह एक बकरे (मेमने)की कुर्बानी दिलवा दी| तभी से बकरीद के बकरे के कुर्बानी का प्रचलन शुरू हुआ|

अपने प्यारे पशु की कुर्बानी दी जाती है

बकरीद का त्यौहार जिलहिज्ज के महीने में मनाया जाता है | बकरीद के दिन कुर्बानी देने से पहले पशुओं को अच्छी तरह से खिलाया पिलाया जाता है, जिससे उन पशुओं से लगाव हो हो जाए क्योंकि बकरीद के दिन अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी दी जाती है | आपको बता दें कि उन पशुओं की कुर्बानी नहीं दी जाती है जो बीमार हो या जिनका कोई भी शरीर का हिस्सा कटा हो या टूटा हो|

कुर्बानी के मांस का वितरण

कुर्बानी के बाद मांस के तीन टुकड़ों को बांट दिया जाता है एक हिस्सा गरीबों को दे दिया जाता है तथा दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों को दे दिया जाता है और तीसरा हिस्सा अपने लिए रखा जाता है।

कुर्बानी देनें का मकसद क्या है

बकरीद का त्यौहार हजरत इब्राहिम के कुर्बानी को याद करने के लिए मनाया जाता है |जिस तरह हजरत इब्राहिम ने अल्लाह के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए अपने बेटे इस्माइल का कुर्बानी देने का फ़ैसला किया इसीलिए बकरीद त्योहार मनाया जाता है | कुर्बानी का मतलब होता बलिदान जो दूसरों के लिए दिया जाता है |

कुर्बानी की प्रक्रिया

बकरीद के त्यौहार के दिन इस्लाम धर्म के लोग साफ सुथरा होकर नए कपड़े पहन कर नमाज पढ़ते हैं और उसके बाद कुर्बानी देने की प्रक्रिया शुरू होती है ।

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